पुस्तक-परिचय

लोकविद्या का विचार 1980-90 दशक के किसान आन्दोलन में जन्मा और विस्तार पाया. अब एक बार फिर किसान आन्दोलन ने यह मौका तैयार किया है कि लोकविद्या का विचार समाज, राष्ट्र और राज्य-सत्ता की अवधाराणाएँ तथा स्वराज की स्थापना पर व्यापक संवाद और अभियान का निर्माण करे. यह पुस्तक इसी दिशा में एक कदम है.

‘विषय-प्रवेश’ पुस्तक के बृहत् संदर्भ को स्पष्ट करता है. पिछले तीन-चार दशकों में अस्तित्व में आई व्यापक जन-विरोधी प्रणालियों के वर्चस्व की वर्त्तमान वैश्विक परिस्थितियों में किसान आंदोलन किन अर्थों में विचार और सामाजिक पुनर्निर्माण के नए रास्ते खोलता है, इस बात की यहाँ ज्ञान परिप्रेक्ष्य में चर्चा की गई है. किसान आंदोलन की शक्ति, दिशा और संभावनाएं तथा उसके विभिन्न पक्षों पर लेख इस संकलन में हैं. पुस्तक के कुल 24 लेख तीन भागों में वितरित हैं.

भाग-1: आन्दोलन में अंग्रेजो द्वारा जमींदारी व्यवस्था देश पर थोपने से लेकर बनती किसानों के असंतोष की पृष्ठभूमि, आन्दोलन की विशेषता और आगे के लिए उसके सबक, संगठन और आन्दोलन में निर्णय-प्रक्रिया के नए रूप, आन्दोलन में सिख-समाज और खापों की महत्वपूर्ण भूमिका, आन्दोलन के मूल्य, और राष्ट्र राज्य-व्यवस्था तथा समाजों के बीच का संघर्ष इन विषयों पर चार लेख हैं.

भाग-2: बाजार, बेरोजगारी और आय में सात लेख हैं. चर्चा के विषय हैं एमएसपी का इतिहास, कानूनन गारण्टी कि माँग का महत्व, वैश्विक बाजार में विषम-विनिमय, बेरोजगारी की जड़, लोकविद्या समाज की आय, स्थानीय बाजार का महत्व और लोकविद्या बाजार की परिकल्पना.

भाग-3: ज्ञान, राजनीति और भावी समाज की दृष्टि में समाहित तेरह लेखों में सामान्य जीवन में अंतर्निहित ज्ञान, लोकविद्या, न्याय त्याग और भाईचारा के मूल्य, अहिंसा और लोकधर्म, खाद्य-संप्रभुता, लोकविद्या समाज की अर्थव्यवस्था, लोकविद्या समाज की एकता, ज्ञान-सत्ता, स्वायत्तता, समाज संगठन, समाज में वितरित सत्ता, और स्वराज इन विचारों की पोटली को लेकर हमारे देश के भावी समाज की उस दृष्टि की और बढ़ने का प्रयास है जो आज की विषम, अन्यायपूर्ण और परजीवी व्यवस्था के सामने चुनौती खड़ी कर सके, और साथ ही न्याय, त्याग और भाईचारे के मूल्यों पर आधारित समाज की वास्तविक संभावना के प्रति विश्वास जगा सके. इन लेखों में विशेष तौर पर किसान आंदोलन के उत्तरोत्तर विकासशील गति की पहचान है और यह मान्यता कि किसान आंदोलन एक नई समाज रचना के बारे में साेचने और उसकी ओर बढ़ने का प्रस्थान बिंदु हो सकता है.

लेखों के उपरोक्त तीन भागों में विभाजन के बारे में यहाँ यह कह देना भी उचित होगा कि यह विभाजन मोटे तौर पर किया गया है, और कई लेख एक से अधिक भागों में समाहित विषयों को छूते हैं.

लेखों के अलावा पुस्तक में 15 फेसबुक पोस्ट शामिल की गईं हैं. ये सभी आन्दोलन की शुरुआत के बाद से समय-समय पर लिखी गई हैं. इनमें से कुछ आन्दोलन के अलग-अलग आयामों को लेकर हैं, और कुछ आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में भावी समाज के लिए व्यापक दृष्टि प्रस्तुत करती हैं. उनमें कही बातों के आधार पर उन्हें भी अलग-अलग उपरोक्त तीन भागों में अंत में समाविष्ट किया गया है. अंत में “देखें बूझें अपने गाँव” यह प्रेमलता जी की कविता शामिल है.

अधिकतर लेख आन्दोलन के दौरान, और उसके कुछ पहले से भी, लोकविद्या विचार और कुल किसान आन्दोलन की पृष्ठभूमि पर विद्या आश्रम और लोकविद्या जन आन्दोलन के साथियों के बीच लगातार चले आपसी संवाद का नतीजा हैं. इसमे श्री विजय जावंधिया और श्रीमती कविता कुरुगंटी के लेख अपवाद कहे जा सकते हैं. कविता जी इस आन्दोलन में खुद शरीक थीं और आन्दोलन के दौरान सरकार के साथ किसानों की तरफ से चर्चा में शामिल संयुक्त किसान मोर्चा के प्रतिनिधि मंडल की एकमात्र महिला सदस्या. श्री विजय जावंधिया पिछले देशव्यापी किसान आन्दोलन में सक्रिय महाराष्ट्र की शेतकरी संघटना के पूर्व अध्यक्ष और किसानों के बड़े नेता हैं. 1980 के दशक के किसान आन्दोलन के दौरान गठित अखिल भारतीय किसान समन्वय समिति में, जिसके विजय जी समन्वयक भी थे, उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी. उस आन्दोलन के काल में विद्या आश्रम के साथी ‘मजदूर किसान नीति’ पत्रिका के प्रकाशन (1977-87) के साथ किसान आन्दोलन में और समन्वय समिति के साथ भी सक्रिय थे. विद्या आश्रम, वाराणसी और अन्य कई स्थानों पर हुई बैठकों और महामारी के दौरान ऑनलाइन चर्चाओं में कई अवसरों पर विजय जी के साथ से हमने बहुत कुछ पाया है. इस पुस्तक के अन्य सभी लेखक किसान आन्दोलन और फिर लोकविद्या जन आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी करते रहे हैं. इन सभी का संक्षिप्त परिचय पुस्तक आगे दिया गया है.

आन्दोलन में शहीद हुए किसानों कि याद में नत-मस्तक हो हम यह पुस्तक आन्दोलन के कार्यकर्ताओं और वाचकों के हाथ में सौंप रहे हैं. हम आशा करते हैं कि पुस्तक वैश्विक परिप्रेक्ष्य में सभ्यता के पुनर्निर्माण में किसान की भूमिका की दावेदारी प्रस्तुत कर सकेगी.

कृष्ण गाँधी, गिरीश सहस्रबुद्धे

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जहाँ गाँव नहीं, वहाँ सभ्यता नहीं!

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