विषय-प्रवेश

सुनील सहस्रबुद्धे

सभ्यतागत सन्दर्भों में राज्य की पुनर्रचना की जो बात उठी है, उसमें सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सन्दर्भों को तो शामिल किया जाता है लेकिन ज्ञान के सवाल पर सब मौन दिखते है। लोकविद्या जन आन्दोलन यह सोचता है कि राज्य की सभ्यतागत पुनर्रचनाओं में ज्ञान के सवाल को केन्द्रीय स्थान मिलना चाहिए और किसान आन्दोलन ने इसके लिए जमीन बनाई है। भारत में ‘सभ्यतागत’ का अर्थ है संत-परम्परा, उसी से लोगों का जीवंत सम्बन्ध है। वहीं से सामान्य जीवन की निरंतरता की समझ और उसके मूल्य मिलते हैं। यही भारत की महान परम्परा है। भारत की महान परम्परा वह नहीं है जो बड़ी आसानी से हिंसा, आक्रमण, धार्मिक संगठन और ज्ञान आदि में यूरोप अथवा रूस के विचारों और वास्तविकताओं से समझौता कर ले। विद्या आश्रम ने लोकविद्या विचार के जरिये ज्ञान की दुनिया में दखल का विचार बनाया और उसे कुछ हद तक आकार दिया। शायद अब समय है कि सभ्यतागत सन्दर्भों में लोकविद्या आधारित, संत-परंपरा संदर्भित राज्य की कल्पना बनाई जाये। 20वीं सदी के सबसे बड़े संत महात्मा गाँधी ने ऐसे ही रास्ते की पैरोकारी की। 2021-22 के महान किसान आंदोलन ने इस दिशा में एक नई आशा का संचार किया है।

इतना बड़ा किसान आन्दोलन सरकार की पूरी आक्रामकता झेलते हुए भी शांतिपूर्ण बना रहा इसमें केवल न्याय का आग्रह रखने वाले संघर्षों के लिए ही एक नजीर नहीं है तो भारत के भविष्य और उसके साथ-साथ दुनिया के भविष्य की व्यवस्थाओं के बारे में सोचने के लिए संकेत व आग्रह भी हैं। एक बार फिर बात इस पर आकर टिक गई है कि किसान और सभ्यता का आपस में एक अविच्छेद्य सम्बन्ध है। भोजन की आवश्यकता की पूर्ति और आपसी सहयोग यानि भाईचारा के मूल्यों और उनके व्यवहारिक रूपों से लेकर एक कहावत बनती है कि “जहाँ गाँव नहीं वहाँ सभ्यता नहीं”। जिन लोगों पर किसान आन्दोलन प्रभाव नहीं डाल पा रहा था वे भी वैश्विक घटनाओं के चलते इस बहस में खिंच आये हैं।

जो लोग किसानों के आन्दोलन से परिचित हैं, वे जानते हैं कि वर्तमान आन्दोलन उसी महान किसान आन्दोलन का हिस्सा है और उसे आगे बढ़ाता है जो 1980 में शुरू होकर तमिलनाडु, कर्णाटक, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर फ़ैल गया था और जिसकी हलचल गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, उड़ीसा और बिहार में उस दौर में देखी गई थी। इस आन्दोलन का विचार विशेषरूप से ध्यान देने योग्य है। इस आन्दोलन ने देश को भारत-इण्डिया के रूप में विभाजित अथवा इन दो हिस्सों से बने हुए देश के रूप में देखा और यह कहा कि गाँव की गरीबी के कारक गाँव के बाहर हैं। यानि यह कि इण्डिया की सारी चमक भारत को गरीब रख कर आती है। किसान के उत्पादन को न्यायोचित मूल्य न देकर कृषि को लगातार घाटे का बनाया जाता है। कृषि का यही घाटा तरह-तरह के रास्ते तय करके सरकारी खजाने में और व्यापारियों (उद्योगपतियों) के धन के रूप में प्रकट होता है। इस स्थिति को बदलने के विचार और कार्य एक नई आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं और उस ओर बढ़ने के रास्ते भी खोलते हैं। वर्तमान किसान आन्दोलन में इतने बड़े पैमाने पर एकजुट होकर और सैकड़ों किसानों के प्राणों की कुर्बानी देकर इसी दिशा में एक मज़बूत कदम फिर से रखा है।

इस दौरान दुनिया भर में हुए घटनाक्रमों पर एक नज़र डाली जाए तो वह व्यापक वैश्विक सन्दर्भ मुखर होकर सामने आएगा जिसमें भारत का यह 2020 में शुरू हुआ किसान आन्दोलन अवस्थित है। फिर नई संभावनाओं को लेकर इसका सन्देश समझने और बनाने में अच्छी मदद हो सकती है।

रूस यूक्रेन जंग के साथ दुनिया भर में एक वैचारिक जंग भी शुरू हो गई है। सोच और व्यवहार के प्रकट रूपों पर पश्चिम (यूरोप और अमेरिका) का दबदबा बना हुआ है। राजनीति में भी राष्ट्र राज्य का निर्माण यूरोप  के ऐतिहासिक और वैचारिक सन्दर्भों में हुआ। लेकिन अब रूस कह रहा है कि वह रूस की महान परम्परा के सन्दर्भ में राज्य का पुनर्निर्माण करेगा। भारत भी इस किस्म की बात कर रहा है। इस्लाम की दुनिया और चीन भी ऐसी बात करते हैं। पश्चिम के दबदबे से अपने को मुक्त करते हुए विविध सभ्यताओं के सन्दर्भ में नई राजनीतिक वास्तविकताएं बनने की यह पूर्व संध्या मालूम पड़ती है।

सभ्यतागत सन्दर्भों में राज्य की पुनर्रचना की जो बात उठी है, उसमें सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सन्दर्भों को तो शामिल किया जाता है लेकिन ज्ञान के सवाल पर सब मौन दिखते है। साइंस की अकथित सर्वमान्य स्थिति ही दिखाई देती है। अपनी ज्ञान परम्पराओं की बात आती भी है तो यह कहते हुए आती है कि हमारे यहाँ भी पहले से साइंस है। यानि साइंस की ‘ज्ञान और उसकी तार्किक संरचना’ के विकल्प के रूप में कुछ सामने नहीं आता और प्रकारान्तर से पश्चिम का वैचारिक, दार्शनिक दबदबा बना रहता है।

लोकविद्या जन आन्दोलन यह सोचता है कि राज्य की सभ्यतागत पुनर्रचनाओं में ज्ञान के सवाल को केन्द्रीय स्थान मिलना चाहिए और किसान आन्दोलन ने इसके लिए ज़मीन बनाई है। सांस्कृतिक सभ्यतागत परम्पराओं में ज्ञान के विविध अर्थ मिलते हैं और उन अर्थों में परम्परा में ज्ञान की मौलिक और केन्द्रीय भूमिका होती है। इस तरह सोचा जाये तो राज्य की सभ्यतागत पुनर्रचना ‘स्वराज’ की ओर ले जाये ऐसा हो सकता है। ऐसा सोचने के लिए पिछले तीन दशकों की उन वैश्विक घटनाओं पर गौर करना ज़रूरी हैं जिनमें ‘राज्य’ की अवधारणा को विविध लोकस्थ ज्ञान पर आधारित बनाने/होने का आग्रह रहा है।

कहा जा सकता है कि 1990 में सोवियत यूनियन के टूटने, इन्टरनेट के आने, वैश्वीकरण के शुरू होने और दूसरे खाड़ी युद्ध के साथ दुनिया ने एक नए युग में प्रवेश किया। सभी तरह के बड़े-बड़े परिवर्तन हुए। शोषण के नए रूप अस्तित्व में आये। नई आक्रामक जन विरोधी व्यवस्था को नये साम्राज्य का नाम दिया गया तथा इसके विरोध में नये किस्म के आन्दोलन सामने आये। वाया कम्पेसिना के नाम से एक अंतर्राष्ट्रीय किसान आन्दोलन ने आकार लिया जिसने ‘खाद्य संप्रभुता’ के नाम पर खाद्द्य को बाज़ार से अलग करने और किसान के इर्द-गिर्द स्थानीय व्यवस्थाओं से जोड़ने का विचार दिया। विश्व सामाजिक मंच ने दुनिया भर में वैश्वीकरण और अमेरिका के विरोध में माहौल बनाया। जल-जंगल-ज़मीन पर स्थानीय लोगों के अधिकार के आन्दोलन चले। पश्चिम के कई देशों में छात्र आन्दोलन ने उत्पादन के स्थलों पर होने वाले किसान और मजदूर प्रतिरोध को बाज़ार और विश्वविद्यालय में ले जाने का विचार सामने लाया।

इसी दौर में दक्षिणी अमेरिका और मेक्सिको के देशज आन्दोलनों ने संस्कृति और ज्ञान की विविध धाराओं को सम्मान देने वाले ‘प्लूरीनेशनल स्टेट’ की बात की और स्थापना भी की। उन्होंने इस दुनिया को कई दुनियाओं से बना हुआ बताया और यह कहा कि सभी दुनियायें आपस में शांति के साथ रह सकती हैं और यह कि इसी में अब बदलाव की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के सूत्र हैं।

किसान आन्दोलन ज्ञान की राजनीति के नये पैमाने गढ़ रहा है। ज्ञान की एक नई दार्शनिक व्याख्या की मांग प्रस्तुत कर रहा है। यह 1980 के दशक के किसान आन्दोलन की वही मांग है, जिसके चलते लोकविद्या विचार ने जन्म लिया और यह स्थापना की कि ज्ञान मनुष्य का स्वाभाविक गुण है और यह कि सभी मनुष्य – किसान, कारीगर, आदिवासी, महिलाएं, छोटे-छोटे दुकानदार, सभी सामान्य जन – ज्ञानी होते हैं और यह कि उनके ज्ञान में उस नैतिक दृष्टि का समावेश होता है जिसके चलते वह ज्ञान उस नई दुनिया की रचना के रास्ते खोलता है जिसमें न्याय, त्याग और भाईचारा बड़े नैतिक मूल्यों के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं। इस बात को वर्तमान राजनीतिक सन्दर्भों में सार्वजनिक किया जाना चाहिए।  उदहारण के लिए भारत में ‘सभ्यतागत’ का अर्थ है संत-परम्परा, उसी से लोगों का जीवंत सम्बन्ध है। वहीँ से सामान्य जीवन की निरंतरता की समझ और उसके मूल्य मिलते हैं। यही भारत की महान परम्परा है। भारत की महान परम्परा वह नहीं है जो बड़ी आसानी से हिंसा, आक्रमण, धार्मिक संगठन और ज्ञान आदि में यूरोप अथवा रूस के विचारों और वास्तविकताओं से समझौता कर ले। विद्या आश्रम ने लोकविद्या विचार के जरिये ज्ञान की दुनिया में दखल का विचार बनाया और उसे कुछ हद तक आकार दिया। शायद अब समय है कि सभ्यतागत सन्दर्भों में लोकविद्या आधारित, संत परंपरा संदर्भित राज्य की कल्पना बनाई जाये। 20वीं सदी के सबसे बड़े संत महात्मा गाँधी ने ऐसे ही रास्ते की पैरोकारी की। 2021-22 के महान किसान आन्दोलन ने इस दिशा में एक नई आशा का संचार किया है। समाज से सरोकार रखने वाले और परिवर्तन के आकांक्षी सभी लोगों को एक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया है। कई बातें मुखर होकर सामने आई हैं। किसान ज्ञानी है। वह एक विश्वदृष्टि रखता है। अन्य समाजों को साथ लेकर एक नई दुनिया बनाने की क्षमता रखता है। न्याय, त्याग और भाईचारा के मूल्य बड़े पैमाने पर सामने आये हैं और देश व समाज की पुनर्रचना के लिए दिशाबोध देते हैं। साथ में कृषि उत्पादों के लिए न्यायसंगत मूल्य की मांग को आगे रखकर आय में संवर्धन को केन्द्रीय मुद्दा भी बनाया है। पारंपरिक सभ्यताओं का यह विचार रहा है कि “जहाँ गाँव नहीं वहाँ सभ्यता नहीं”।

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जहाँ गाँव नहीं, वहाँ सभ्यता नहीं!

जहाँ गाँव नहीं, वहाँ सभ्यता नहीं!

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