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विद्या आश्रम शोध कार्यक्रम

प्रस्ताव

1995 से अब तक लोकविद्या विचार और दर्शन पर जितने भी चिंतन, प्रकाशन और संगठनात्मक व  रचनात्मक कार्य हुए हैं वे एक नई विश्वदृष्टि का व्यापक फलक बनाते हैं. सृष्टि और समाज में न्याय, त्याग और भाईचारा पर गढ़ी हुई बुनियादी सत्ता का सत्य ‘लोकविद्या’ और ‘सामान्य जीवन’ के आपसी गतिशील संबंधों में बसा दिखाई देता है. इस सत्य के उजाले में समाज की परिवर्तनकारी शक्तियों की खोज, निर्माण, संवर्धन, नवीनीकरण आदि के प्रयास मनुष्य और मनुष्य समाज की गतिविधियों के उन विविध पक्षों से साक्षात्कार करा सकते हैं, जो एक नई और बेहतर दुनिया को बनाने के आधार होंगे.इस ओर बढ़ने की दृष्टि से एक शोध का विचार पत्र प्रस्तुत है.

अधिकांश विचारों की व्याख्या और सन्दर्भ विद्या आश्रम की वेबसाईट www.vidyaashram.org और लोकविद्या जन आन्दोलन के ब्लॉग www.lokavidyajanandolan.blogspot.com  तथा दर्शन अखाडा के ब्लॉग www.darshanakhadablog.wordpress.com  पर मिलेंगे.


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बहुजन दर्शन - सुनील सहस्रबुद्धे

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बहुजन दर्शन

सुनील सहस्रबुद्धे

बहुजन, लोकविद्या, सामान्य जीवन, पंचायत, स्वराज, कला (नैतिकता) के आपसी सम्बन्ध बहुजन दर्शन में प्रवेश का एक मार्ग प्रशस्त करते हैं. इस दिशा में नीचे के वाक्य मदद कर सकते हैं.

  1. बहुजन का ज्ञान लोकविद्या है. लोकविद्या बहुजन समाज में बसती है.
  2. बहुजन का जीवन सामान्य जीवन है. सामान्य जीवन का दिशा बोध बहुजन समाज के मूल्यों से प्राप्त होता है.
  3. बहुजन का संवाद और निर्णय का स्थान पंचायत है. पंचायत का सर्वानुमति का तरीका बहुजन समाज में निर्णय के तरीके का आदर्श है.
  4. बहुजन का शासन – प्रशासन का आदर्श स्वराज है. स्वराज बहुजन की आध्यात्मिक और लौकिक रचना है.
  5. बहुजन की सारी गतिविधियाँ कला/भाव गर्भित होती हैं. भाव प्रधान तर्क बहुजन के तर्क का रूप है.
  6. लोकविद्या सामान्य जीवन का मार्ग दर्शक ज्ञान है. सामान्य जीवन लोकविद्या का घर है.
  7. लोकविद्या अपने नीति/भाव प्रधान स्वभाव के चलते पंचायत का ज्ञान आधार बनती हैः पंचायत लोकविद्या को श्रेष्ठ ज्ञान का स्थान देती है.
  8. लोकविद्या में स्वराज का ज्ञान आधार होता है. स्वराज लोकविद्या का स्थूल रूप है.
  9. लोकविद्या कला/भाव सापेक्ष होती है तथा इसमें तर्क भाव-प्रधान होता है. (लोक)कला लोकविद्या का ही रूप है.
  10. सामान्य जीवन में पंचायत की सहज स्वीकृति है. पंचायत सामान्य जीवन का ही अंग है.
  11. सामान्य जीवन में हर सामाजिक इकाई की स्वायत्तता स्वराज को सामाजिक आधार देती है. स्वराज में सामान्य जीवन अपनी विसंगतियां स्वयं हल करता है.
  12. सामान्य जीवन की हर गतिविधि भाव पूर्ण और नीति सापेक्ष होती है. कला सामान्य जीवन के हर अवयव में व्याप्त होती है.
  13. पंचायत स्वराज में निहित स्वायत्तता और सामूहिकता को रेखांकित करती है. स्वराज में नियम संयम के पालन का दारोमदार पंचायत पर होता है.
  14. पंचायत एक नैतिक बल का रूप है. नैतिक सामाजिक निर्णयों का स्थान ही पंचायत है.
  15. स्वराज वह सोच और व्यवस्था है जिसमें हर घटना या क्रिया नीति सापेक्ष होती है. कला का स्थान जब ज्ञान की दुनिया में सर्वोच्च होता है, स्वराज एक प्राकृतिक अवस्था के रूप में पहचाना जाता है.

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Bahujan Darshan

Sunil Sahasrabudhey

Reflection on how Bahujan, Lokavidya, Ordinary Life, Panchayat, Swaraj and Art (aesthetic-ethical) are interwoven provides a possible entry into Bahujan Darshan. The following premises may prove helpful in this context.

  1. Bahujan knowledge is Lokavidya. Lokavidya resides in Bahujan Samaj.
  2. Bahujan life is Ordinary Life. Values of Bahujan Samaj guide Ordinary Life.
  3. Panchayat is the location of Bahujan discourse and resolve / decision-making. Bahujan ideal of consensus guides the Panchayat process.
  4. The ideal of Bahujan governance is Swaraj. Swaraj is secular and spiritual creation of the Bahujan.
  5. Art / emotion infuse every Bahujan act. Bahujan logic epitomizes art / emotion.
  6. Ordinary Life finds its knowledge-referral in Lokavidya. Lokavidya dwells in Ordinary Life.
  7. Lokavidya forms the knowledge base of the Panchayat because of its ethical / emotional kernel. The Panchayat accords Lokavidya the status of supreme knowledge.
  8. Lokavidya is the knowledge base of Swaraj. Swaraj is the gross expression of Lokavidya.
  9. Art / emotion contextualize Lokavidya. The logic of Lokavidya is infused with art / emotion. (Loka)Kala is the very form of Lokavidya.
  10. Ordinary Life accords routine acceptance to Panchayat. Panchayat is an aspect of Ordinary Life.
  11. In Ordinary life autonomy of every social formation is the social foundation of Swaraj. In Swaraj, Ordinary Life resolves its own inconsistencies.
  12. Every process in Ordinary Life relates to emotion and ethical reflection. Art pervades every aspect of Ordinary Life.
  13. Panchayat underlines autonomy and the sense of community inherent in Swaraj. In Swaraj, Panchayat ensures adherence to norms and rules.
  14. Panchayat is a form of moral agency. The process of ethical and social resolve / decision-making is located in Panchayat.
  15. Swaraj is that thought and arrangement in which every process and act relate to moral-ethical consideration. When Art is sovereign in the world of knowledge, Swaraj is perceived as a natural formation.

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बहुजन दर्शन

सुनील सहस्रबुद्धे

बहुजन, लोकविद्या, सामान्य जीवन, पंचायत, स्वराज, कला (नैतिकता) यांचे परस्पर संबंध बहुजन दर्शनात प्रवेश करण्याचा एक मार्ग उघडतात. या दिशेने खालील वाक्ये मदत करू शकतात हैं.

  1. बहुजनांचे ज्ञान म्हणजे लोकविद्या. बहुजन समाज म्हणजे लोकविद्येचे माहेर.
  2. बहुजनांचे जीवन म्हणजे सामान्य जीवन. सामान्य जीवनाची दिशा बहुजन समाजाच्या मूल्यांच्या माध्यमातून समजू शकते.
  3. बहुजनांचे संवाद आणि निर्णयाचे स्थान म्हणजे पंचायत. पंचायतीचे सर्वानुमतीचे तत्त्व हेच बहुजनांत निर्णय-प्रक्रियेचा आदर्श होय.
  4. बहुजनांच्या शासन–प्रशासनाचा आदर्श म्हणजे स्वराज. स्वराज बहुजनांची आध्यात्मिक आणि लौकिक निर्मिती होय.
  5. बहुजनांच्या सर्व क्रिया कला / भावनांनी परिपूर्ण असतात. भाव-प्रधान तर्क हा बहुजनांचा तर्क-प्रकार होय.
  6. लोकविद्या हे सामान्य जीवनाचे मार्गदर्शक ज्ञान होय. सामान्य जीवन हे लोकविद्येचे माहेर होय.
  7. आपल्या नीती-प्रधान व भाव-प्रधान पिंडामुळे लोकविद्या पंचायतीचा ज्ञानाधार ठरते; पंचायत लोकविद्येला श्रेष्ठ ज्ञानाचा दर्जा देते.
  8. लोकविद्येत स्वराज चा ज्ञानाधार असतो. स्वराज लोकविद्येचे स्थूल रूप होय.
  9. लोकविद्या कला / भाव सापेक्ष असते आणि तिच्यातील तर्क भाव-प्रधान असतो. (लोक)कला ही लोकविद्येचेच एक रूप आहे.
  10. सामान्य जीवनात पंचायतीला सहज स्वीकृती आहे. पंचायत हे सामान्य जीवनाचेच एक अंग आहे.
  11. प्रत्येक सामाजिक घटकाची स्वायत्तता हा सामान्य जीवनात स्वराज चा सामाजिक आधार होय. स्वराज म्हणजे सामान्य जीवनाच्या अंतर्गत विसंगती / अंतर्विरोध सोडवण्याची क्षमता असणारा शासन प्रकार होय.
  12. सामान्य जीवनातील प्रत्येक क्रिया भावपूर्ण आणि नीति-सापेक्ष असते. कला सामान्य जीवनाच्या प्रत्येक आयामात भिनलेली असते.
  13. पंचायत स्वराज मध्ये अंतर्भूत असलेली स्वायत्तता आणि सामुदायिकता अधोरेखित करते. स्वराज टिकवण्यासाठी नियम–संयम पाळण्याची जबाबदारी पंचायत पार पाडते.
  14. पंचायत नैतिक ताकदीचे रूप होय. नैतिक-सामाजिक निर्णयाचे स्थान म्हणजे पंचायत.
  15. स्वराज ही अशी विचारसरणी आणि व्यवस्था आहे ज्यात प्रत्येक घटना किंवा क्रिया नीति-सापेक्ष असते. ज्ञान-जगात जेव्हा कलेचे स्थान सर्वोच्च असते तेव्हा स्वराज एक नैसर्गिक अवस्था म्हणून मान्यता पावते.

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