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बहुजन स्वराज पंचायत

2, 3, 4 दिसंबर 2026

गाँधी भवन, छतरपुर, मध्य प्रदेश

प्रथम घोषणा / निमंत्रण


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प्रिय सह-साधक,

उपरोक्त त्रिदवसीय पंचायत में आप सादर आमंत्रित हैं।

यह निमंत्रण ढाई महीना पहले ही भेजा जा रहा है जिस से आप उन दिनों अन्य कार्यक्रमों से टकराव टाल सकेंगे और अपनी यात्रा से संबंधित रिजर्वेशन आदि एडवांस में कर सकेंगे। हम आशा करते हैं कि आप पंचायत के एक सप्ताह पहले अपनी उपस्थिति कन्फर्म करेंगे।

उपरोक्त पंचायत के आयोजक मोटे तौर पर 1980 के दशक से देश भर में उभरे किसान आंदोलन, PPST (Patriotic People-oriented Science and Technology) अभियान, लोक विद्या जन आंदोलन आदि आंदोलनों के सहभागी रहे हैं तथा विद्या आश्रम, वाराणसी से सांगठनिक रूप से जुड़े रहे हैं। इन आंदोलनों तथा इस दौरान हुए राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रमों पर हमारा समूह लगातार संवाद करते आये है और एक साझी समझ पर पहुंचने के प्रयास करते आये हैं।

इस पंचायत के आयोजन में गांधी भवन छतरपुर का पूरा सहयोग हमे प्राप्त है। इसके लिए हम श्री संजय सिंह व सुश्री दमयंती पानी के आभारी हैं। छतरपुर और आसपास के कई सामाजिक कार्यकर्ता इस पंचायत में शामिल होंगे।

बहुजन स्वराज पंचायत के विचारणीय मुद्दे

बहुजन कौन है? क्या हम स्वयं को बहुजन मानते  है? स्वयं को बहुजन मानने के मायने क्या हैं?

बहुजन से हमारा तात्पर्य है सामान्य जीवन जीने वाले सामान्य लोग। जो स्वयं को विशिष्ट नहीं मानते हैं, न ही विशिष्ट होने का दावा करते हैं। राजसत्ता के वे हिस्सेदार नहीं है; बल्कि सत्ता के सताए हुएं हैं। कॉलेज, विश्वविद्यालय, शोध संस्थान, आदि संगठित ज्ञान की संस्थाओं के बाहर, अपने अनुभव और समाज में मौजूद असंगठित ज्ञान के स्रोतों से अर्जित अपनी समझ, कौशल और विद्या (अर्थात लोकविद्या) के बदौलत वे जीवनयापन करते हैं। बहुजन में मुख्य रूप से किसान, कारीगर, आदिवासी, महिला, छोटे व्यापारी और छोटे उद्यमी आते हैं जो असंगठित और वितरित उत्पादन-वितरण प्रणालियों के हिस्सेदार हैं। लेकिन जरूरी नहीं कि बहुजन इन्हीं श्रेणियों से ही आयें; सामान्य जीवन जीनेवाले सब लोग बहुजन हैं। बहुजन की परिभाषा करना अपेक्षतया आसान है। लेकिन असल चुनौती स्वयं को बहुजन के रूप में पहचानना और जीना है। स्वयं को मूल रूप से बहुजन मानने के मायने क्या हैं? क्या हम बहुजन की मूल पहचान स्वीकारने के लिए तैयार हैं?

बहुजन की तकदीर कौन तय करते हैं? अपनी तकदीर तय करने का अधिकार क्या बहुजन स्वयं अपने हाथ में लेंगे? बहुजन स्वराज से हम क्या समझते है?

हमारे देश में सत्ता और ज्ञान पर विशिष्ट (स्वयं को विशिष्ट होने का भ्रम पालनेवाले) लोगों का एकाधिकार रहा है। चाहे वे पश्चिमी सोच, सभ्यता, या ज्ञान से जुड़े विशिष्ट लोग हों, या भारत की ब्राह्मणवादी परंपरा से जुड़े विशिष्ट लोग हों, दोनों लोग सोचते हैं कि विशिष्ट लोग होने के नाते उन्हीं का दायित्व है कि वे बहुजन को प्रगति और विकास के मार्ग पर आगे ले जाएं, उनका मार्ग दर्शन / नेतृत्व करें और उन पर राज करें। संक्षेप में बहुजन की तकदीर तय करने का अधिकार विशिष्ट जनों ने स्वयं अपने ऊपर ओढ़ लिया है। पर आज बहुजन जाग रहे हैं। स्वयं की खुशहाली क्या है और उसे प्प्राप्त करने का मार्ग क्या है यह तय करने की जिम्मेदारी कोई विशिष्ट वर्ग, संस्था या सरकार पर छोड़ने की बजाय बहुजन अपनी तकदीर अपने हाथ में लेना चाहते हैं। क्या वे ऐसा कर पाएंगे? बहुजन स्वराज की संभावनाएं बहुत कुछ इस मुद्दे पर निर्भर है।

स्वयं की खुशहाली का मार्ग स्वयं ढूंढना, उसे खुद हासिल करना, यही स्वराज है। एक दूरगामी लक्ष्य न होकर, स्वराज एक सतत प्रक्रिया है, जिसका अभ्यास हमें वर्तमान में हर रोज़ करना है। स्वराज के इस सतत अभ्यास में अहिंसा, भेदभाव विहीन सहजीवन, न्याय, त्याग और भाईचारा हमारे मार्ग दर्शक सिद्धांत हैं। बहुजन स्वराज का यह मार्ग चुनौतीपूर्ण हैं। एक बड़ी चुनौती बहुजन का जन्म से जुड़ी पहचान के आधार पर बंटना और भेदभाव का शिकार होना हैं। बहुजन को बांट कर उनपर राज करने की विशिष्ट जन की नीति बहुत पुरानी है। समाज में व्याप्त भेदभाव दूर करने के लिए हजारों वर्षों से संत और ज्ञानी संघर्ष करते आये हैं। उन से हमे प्रेरणा लेनी होगी। जब तक बहुजन स्वराज स्थापित नहीं होगा, यानी जब तक सत्ता विशिष्ट जन के हाथ में रहेगी, बहुजन के आपसी भेदभाव मिटाना हमारे लिए एक बड़ी चुनौतीपूर्ण कार्य रहेगा।

विविधता और भेदभाव में फर्क

भेदभाव और विविधता के बीच का फर्क समझना जरूरी है। यह तार्किक लगता है कि जैसे विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में वनस्पति और प्राणी विभिन्न रूपों में प्रकट होते हैं, उसी प्रकार विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में  मानव समाज भी विभिन्न रूपों में प्रकट होते हैं। मतलब स्थल काल के अनुरूप मानव समाज भी विविधता के साथ प्रकट होते हैं। यह विविधता शारीरिक रूप रंग, वेश भूषा, खान पान, संस्कृति आदि में झलकती है। लेकिन धोखा तब होता है जब हम विविधता को आधार बनाकर भेदभाव करने लगते हैं। हम बहुजन यह कतई नहीं मानते हैं कि विभिन्न मानव समाजों के बीच पदानुक्रम या ऊंच नीच की कोई श्रेणीबद्धता है। लेकिन सत्ता पाने और सत्ता पर काबिज रहने के लिए विशिष्ट जन मानव समाजों के बीच भेदभाव करते हैं और एक दूसरे से लड़ाते हैं। मानव समाजों के बीच पदानुक्रमता के सारे आख्यान हमें नकारना होगा। भेदभाव विहीन तरीके से विविधता को स्वीकार कर उसके साथ जीने की कला – सह जीवन की कला – हमे अपनानी होगी। क्या यह संभव है? विभिन्न नस्ल, धर्म, भाषा, व्यवसाय के लोगों के बीच – गोरे और काले, आदिवासी और गैर आदिवासी, किसान और व्यापारी, स्त्री और पुरुष – इनके बीच भेदभाव करना क्या हम छोड़ सकेंगे?

स्वराज हेतु संयम और साधना करने के लिए क्या हम तैयार हैं?

विविधता के साथ भेदभाव विहीन सहजीवन तभी संभव है जब बहुजन स्वशासित और स्व-अनुशासित जीवन जियेंगे। एक व्यक्ति के स्वराज के कारण दूसरे व्यक्ति के स्वराज का हनन नहीं होना चाहिए, न ही एक समूह के स्वराज के कारण दूसरे समूह के स्वराज का हनन। अत: स्वराज के साथ स्व-संयम अभिन्न रूप से जुड़ा है। और संयम आधारित स्वराज के लिए निरंतर अभ्यास या साधना आवश्यक है। अर्थात, साधना का विषय है स्वराज। इसीलिए हमने आपको सह-साधक संबोधित किया है। क्या हम स्वराज-साधना के लिए तैयार हैं?

क्या आज के ग्राम पंचायत और स्थानीय स्वशासन की अन्य इकाइयां बहुजन स्वराज के आधार स्तंभ बन सकते हैं? इसकी क्या संभावनाएं हैं?

हमारी परंपरा में पंचायत सामाजिक गतिविधि का केंद्र तथा सामूहिक विचार विमर्श और निर्णय का स्थान रहा है। पंचायत में पंच परमेश्वर के मार्गदर्शन में सर्वसम्मति से निर्णय लिए जाते हैं। भले ही इसमें विकृतियाँ रहीं हों फिर भी बहुमत का अल्पमत पर वर्चस्व स्थापित करनेवाली आधुनिक लोकतांत्रिक परिपाटी की तुलना में पंचायत कहीं ज्यादा स्वराजोन्मुख है। स्वराज में पंचायत के इस महत्वपूर्ण भूमिका की ओर इंगित करने के लिए ही हमने कार्यक्रम को पंचायत का नाम दिया है।

जहां पंचायत गैर सरकारी सामाजिक अभिव्यक्ति की जीवंत परंपरा के रूप में आज भी विद्यमान है, वहीं स्थानीय स्वशासन की इकाई के रूप में ग्राम पंचायत को संविधान के 73वाँ संशोधन के माध्यम से संवैधानिक दर्जा प्राप्त है। बहुजन स्वराज में इन पंचायती संस्थाओं की सकारात्मक भूमिका क्या हो सकती है इस पर सोच विचार करने की आवश्यकता है। हम मानते हैं कि ग्राम पंचायतों को और स्वशासन की अन्य स्थानीय इकाइयों को बहुजन स्वराज के आधारभूत स्तंभ बनाए जा सकते हैं। इसे संभव बनाने के लिए पंचायती संस्थाओं को कौनसे संवैधानिक अधिकार अतिरिक्त दिए जाएं, और उन्हें आर्थिक रूप से कैसे सशक्त बनाए जाएं ये विचारणीय मुद्दे हैं। उदाहरण के लिए वोटर लिस्ट तैयार करना, नागरिकता की पुष्टि करना, खाद्य सुरक्षा/ संप्रभुता की गारंटी देना, स्थानीय संसाधनों का प्रबंधन करना ऐसे बहुत सारे कार्य हैं जो पंचायतों के अधिकार क्षेत्र में लाये जा सकते हैं। विशेष रूप से लोकतंत्र के सबसे मौलिक और सशक्त पायदान के रूप में ग्राम सभाओं को पुनर्जीवित करना बहुजन स्वराज की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।

सबसे बड़ी समस्या ग्राम पंचायतों की चुनावी प्रक्रिया और ग्रामपंचायतों में निर्णय लेने की विधि को लेकर है। पंचायत सदस्य और सरपंच के चुनाव बहुमत के आधार पर करने की वर्तमान परिपाटी का नतीजा यह है कि जीतनेवले और हारनेवाले प्रत्याशियों के बीच कटुता के चलते गांव में गुटबाजी पनपती है। सबसे अधिक वोट पानेवाले प्रत्याशी को जिताने की पद्धति त्यागने के बारे में भी सोचना होगा। पंचायत सदस्यों के बीच सर्वसम्मति से निर्णय लेने की पंचायती परंपरा की पुनः स्थापना करनी होगी। पंचायतों पर सरकारी तंत्र – जिलाधिकारी और उनके नुमाइंदे – का दखल और तानाशाही खत्म करने होंगे। पंचायत को मात्र सरकारी योजनाएं क्रियान्वित करने की संस्था मात्र में बदलने की नीति त्यागना होगा। अपने क्षेत्र के जल जंगल जमीन सहित अन्य स्थानीय संसाधनों के प्रबंधन के संबंध में निर्णय लेने के लिए पंचायत स्वतंत्र होने होंगे। अतः पंचायतों की कार्यशैली और अधिकार क्या हों, इस पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।

विकास के नाम पर जल-जंगल-जमीन से बहुजनों का विस्थापन – बहुजन स्वराज पर यह कुठाराघात कैसे रोकें?

बहुजन के जीवन का आधार जल जंगल और जमीन है। यह आधार छिन जाए तो बहुजन स्वराज की संभावनाएं बहुत हद तक खत्म हो जाती हैं। ये प्राकृतिक संसाधन भौगोलिक रूप से वितरित हैं, और इसलिए इनका सरकारी केंद्रीकृत व्यवस्थापन विरोधाभासपूर्ण और विनाशकारी होगा। वास्तव मेंअंग्रेजों के आने के पहले हमारे देश में जल जंगल जमीन का सामूहिक प्रबंधन ग्रामीणों द्वारा किया जाता रहा। इनकी सम्मिलित मिल्कियत ग्रामीण जनता के पास थी। लेकिन अंग्रेजों ने सारे जल, जंगल जमीन सरकार की संपत्ति घोषित की। साथ में सामूहिक मिल्कियत की परिपाटी को ही खत्म कर व्यक्तिगत मिल्कियत की व्यवस्था लागू की। इसके बुरे नतीजे आज हमारे सामने हैं। जंगलों में अनादिकाल से रहनेवाले आदिवासियों को जंगलों से खदेड़ा जा रहा है। अपनी सहमति और ग्राम सभा की सहमति के बगैर किसान अपनी उपजाऊ जमीन और अपने स्वराजोन्मुख व्यवसाय – कृषि – से विस्थापित किए जा रहे है। पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन की व्यवस्था किए बगैर किसान बेघर और बेसहारा खानाबदोश जीवन जीने के लिए मजबूर किए जा रहे हैं। किसानों और आदिवासियों के स्वराज की संभावनाओं पर कुठाराघात किया जा रहा है, उन्हें “विकास” रूपी राक्षस के शिकार बनाए जा रहे हैं। जल जंगल जमीन पर बहुजन का सामूहिक प्रबंधन की नीति लागू किए बगैर बहुजन स्वराज असंभव है। इस विषय पर भी बहुजन स्वराज पंचायत में महत्वपूर्ण चर्चा होगी।

ज्ञान, स्वराज, शिक्षा और रोजगार – जेन-ज़ी आंदोलन के प्रति बहुजन दृष्टिकोण क्या है?

स्वराज का आधार ही ज्ञान है। अज्ञानी का स्वराज प्राप्त करना नामुमकिन है; प्राप्त कर भी लें तो भी वह अल्प समय के लिए ही कायम रहेगा। कारण, ज्ञानवान अन्य लोग उसपर शीघ्र आधिपत्य जमाएंगे। इस प्रकार समाज में प्रत्येक व्यक्ति का ज्ञानी होना स्वराज की स्थापना की पहली शर्त है। और हम मानते हैं कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति ज्ञानी है। अगर उसके ज्ञान में कुछ कमी है तो भी वह अपनी इस कमी को दूर करने की क्षमता रखता है।  विशिष्ट लोग, विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर या विश्वविद्यालयों तथा उन्नत शिक्षा संस्थाओं में पढ़कर डिग्री प्राप्त करने वालों के पास ही ज्ञान है, ऐसा हम नहीं मानते हैं। किसान, कारीगर, आदिवासी, महिला – बहुजन – भले ही पढ़े-लिखे न हों, और न डिग्रीधारी हों,, अपनी लोकविद्या के बलबूते पर स्वतंत्र रूप में जीवन यापन करते हैं। वे भी ज्ञानी हैं। विश्वविद्यालय या उन्नत शिक्षा संस्थानों में ही ज्ञान केंद्रित है, और अन्यत्र कहीं नहीं है, ऐसा सोचना न केवल गलत है, पर बहुजनों की लोकविद्या का अनादर और अपमान है। विशिष्ट जनों द्वारा बहुजनों की लोकविद्या को ज्ञान नहीं मानना, इस असमानता से शुरू होती है बहुजनों के शोषण की और गुलामी की कहानी। अतः लोकविद्या को मान्यता और प्रतिष्ठा देना और दिलाना बहुजन स्वराज का महत्वपूर्ण कार्य है।

विद्या, विद्यालय, शिक्षण संस्थाओं की स्वायत्तता, शिक्षा नीति, परीक्षा प्रणाली, सरकारी नौकरियों की चयन प्रक्रिया, रोजगार-परक शिक्षा, कौशल विकास आदि तमाम विषयों पर बहुत सारी चर्चाएं जेन-ज़ी के आंदोलन के संदर्भ में देश में चल रही है, जिनका संबंध लोकविद्या और बहुजन स्वराज से है। जेन-ज़ी आंदोलन में बहुजन समाज से निकले बेरोजगार युवा बड़ी संख्या में भाग ले रहे हैं। ऐसे में बहुजन स्वराज के पक्षधर सामाजिक कार्यकर्ता का जेन-ज़ी आंदोलन के प्रति तटस्थ रहना उचित नहीं है। तटस्थ रहकर हम बहुजन युवा वर्ग से संवाद करने का एक अच्छा अवसर खो देंगे। बहुजन स्वराज पंचायत में शिक्षा, रोजगार तथा जेन-ज़ी आंदोलन पर बहुजन दृष्टिकोण क्या है, इस विषय पर एक सत्र आयोजित किया जाना चाहिए। इस को लेकर आपके विचार आमंत्रित है।

अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति से संबंधित हमारी समझ संक्षेप में

ग्लोबलाइजेशन का दौर जिसमें अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी देशों ने कृषि सहित अंतरराष्ट्रीय व्यापार और पूंजी निवेश पर अपना आधिपत्य जमाया वह खत्म हो चुका है। वह एकध्रुवीय दुनिया थी जिसका नियंत्रण अमेरिका के हाथ में था। पिछले बीस-पच्चीस सालों में चीन की ताकत बहुत तेजी से बढ़ी है। साथ में सोवियत यूनियन के टूट जाने के बाद रूस अपनी सामरिक बल, परमाणु हथियार, कच्चा तेल और गैस, तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के बल पर अपनी शक्ति वापस लेने में काफी सफल हो गई है। ऐसे में दुनिया आज बहुध्रुवीय हो गई है। जहां वर्चस्व खत्म होने के कारण पश्चिमी दुनिया में ग्लोबलाइजेशन और बहुपक्षीय समझौतों और संस्थाओं के विरुद्ध वातावरण तैयार हो गया है, वहीं चीन ग्लोबलाइजेशन और बहुपक्षीय संस्थाओं के चैंपियन के रूप में उभर रहा है। साथ में विश्व भर में निरंकुश पूंजीवादी ताकतों और राजसत्ता के बीच बढ़ती सांठगांठ के कारण हर जगह तानाशाहों का उदय हो रहा है। वे दुनिया की आबादी और उनकी गतिविधियों को अपनी एजेंडा के अनुरूप नियंत्रित करना चाहते है। इसकेलियें AI – कृत्रिम बुद्धि – का सहारा लिया जा रहा है। राष्ट्र, संप्रभुता, लोकतंत्र आदि अवधारणाएं अप्रासंगिक हो रहीं हैं। क्या दुनिया के सामने स्वराज एक सशक्त विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है?

उपरोक्त वर्णित विचारणीय मुद्दों पर आपकी प्रतिक्रिया हम जानना चाहते हैं। यदि आप अपनी प्रतिक्रिया लिखकर भेजेंगे तो हम आपके आभारी रहेंगे। इससे पंचायत के विषयवार सत्र क्या होंगे यह तय करने में हमे मदद मिलेगी।

सत्र क्या होंगे और कब होंगीं इसकी विस्तृत सूचना अगले पत्र में दी जाएगी। आप से पुनः निवेदन है कि आप पंचायत में अपनी उपस्थिति की पुष्टि शीघ्र भेजें और साथ में अपनी लिखित प्रतिक्रिया/सुझाव भी भेजें।

सधन्यवाद। विद्या आश्रम वाराणसी तथा गांधी भवन छतरपुर की ओर से

 

             कृष्ण गांधी, झांसी                                                दमयंती पानी, छतरपुर                 

(मोबाइल व्हाट्सएप्प: 9415057535)                     (मोबाइल व्हाट्सएप्प: 9399080336)

दिनांक: 17 सितंबर 2026


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प्रिय सह-साधक,

वरील तीन दिवसीय पंचायतसाठी आपल्याला सादर आमंत्रण.

हे निमंत्रण तीन महिने आधीच पाठवत आहे, जेणेकरून आपले इतर कार्यक्रम ठरवायला आणि आपल्या प्रवासासंबंधी आगाऊ व्यवस्था करायला आपल्याला सोयीचे ठरावे. पंचायतमध्ये आपल्या सहभागाबद्दल कळवावे, अशी विनंती.

वरील पंचायतचे आयोजक आम्ही साधारणपणे १९८० च्या दशकापासून देशभरात उभी राहिली ती शेतकरी चळवळ, PPST (Patriotic People-oriented Science and Technology) अभियान, लोकविद्या जन आंदोलन इत्यादी चळवळींमध्ये सहभाग घेतलेले आहोत, आणि संघटनात्मकरीत्या विद्या आश्रम, वाराणसीशी जोडलेले आहोत. या चळवळी आणि या काळात घडलेल्या राष्ट्रीय/आंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमांवर आमचा समूह सातत्याने संवाद साधत आला आहे आणि त्यांबद्दल समसामयिक अशी समज विकसित करण्याचे प्रयत्न करत आला आहे.

या पंचायतच्या आयोजनासाठी आम्हाला गांधी भवन, छतरपूर, मध्य प्रदेश यांचे पूर्ण सहकार्य लाभले आहे. त्यासाठी आम्ही श्री संजय सिंह आणि सुश्री दमयंती पाणी यांचे आभारी आहोत. छतरपूर आणि आसपासचे अनेक सामाजिक कार्यकर्ते या पंचायतमध्ये सहभागी होतील.

बहुजन स्वराज पंचायतमध्ये विचारार्थ मुद्दे

बहुजन कोण आहेत? आपण स्वतःला बहुजन मानतो का? स्वतःला बहुजन मानणे म्हणजे काय?

बहुजन म्हणजे सामान्य जीवन जगणारी सामान्य माणसे. ती स्वतःला विशिष्ट मानत नाहीत किंवा तसे असण्याचा दावाही करत नाहीत. ती राजसत्तेत भागीदार नाहीत; उलट सत्तेकडून पीडित आहेत. महाविद्यालये, विद्यापीठे, संशोधन संस्था इत्यादी संघटित ज्ञानाच्या संस्थांबाहेर, आपल्या अनुभवांतून आणि समाजात विखुरलेल्या ज्ञानाच्या असंघटित स्रोतांतून मिळवलेला समज, कौशल्ये आणि ज्ञान (म्हणजे लोकविद्या) यांच्या बळावर ती आपली उपजीविका चालवतात. बहुजनांत प्रामुख्याने शेतकरी, कारागीर, आदिवासी, महिला, छोटे व्यापारी आणि छोटे उद्योजक हे लोक मोडतात; ते असंघटित आणि वितरित उत्पादन-वितरण व्यवस्थांचे निर्माते-भागीदार आहेत. परंतु बहुजन केवळ याच वर्गांतून आले पाहिजेत असे नाही; सामान्य जीवन जगणारी सर्व माणसे बहुजन आहेत. बहुजनांची व्याख्या करणे तुलनेने सोपे आहे. पण स्वतःला बहुजन म्हणून ओळखणे आणि तसे जगणे हेच खरे आव्हान आहे. स्वतःला मुळात बहुजन मानण्याचा अर्थ काय? बहुजन ही आपली मूलभूत ओळख स्वीकारण्यास आपण तयार आहोत का?

बहुजनांचे भवितव्य कोण ठरवते? स्वतःचे भवितव्य ठरवण्याचा अधिकार बहुजन स्वतःच्या हातात घेतील का? बहुजन स्वराज चा आपण काय अर्थ लावतो?

आपल्या देशात सत्ता आणि ज्ञानावर अभिजनांचा (स्वतःला विशिष्ट असल्याचा भ्रम बाळगणाऱ्यांचा) एकाधिकार राहिला आहे. ते पाश्चात्त्य विचार, सभ्यता किंवा ज्ञानाशी संबंधित अभिजन असोत अथवा भारतातील ब्राह्मणवादी परंपरेशी संबंधित अभिजन असोत, दोघांनाही असे वाटते की अभिजन असल्यामुळे बहुजनांना प्रगती आणि विकासाच्या मार्गावर नेणे, त्यांना मार्गदर्शन / नेतृत्व देणे आणि त्यांच्यावर राज्य करणे हे आपलेच कर्तव्य आहे. थोडक्यात, बहुजनांचे भवितव्य ठरवण्याचा अधिकार अभिजनांनी स्वतःहून स्वतःकडे घेतला आहे. परंतु आज बहुजन जागृत होत आहेत. आपले कल्याण कशात आहे आणि ते साधायचा मार्ग कोणता, हे ठरवायची जबाबदारी अभिजन वर्गांवर, संस्थांवर अगर सरकारवर सोडण्याऐवजी बहुजन आपले भवितव्य स्वतःच्या हातात घेऊ इच्छितात. हे त्यांना करता येईल का? बहुजन स्वराजाच्या शक्यता मोठ्या प्रमाणात या प्रश्नाच्या उत्तरावर विसंबून आहेत.

स्वतःच्या कल्याणाचा मार्ग स्वतः शोधणे आणि तो स्वतःच्या प्रयत्नांनी साध्य करणे, म्हणजेच स्वराज. स्वराज हे दूरचे ध्येय नसून एक निरंतर प्रक्रिया आहे; तिचा रियाझ आपल्याला वर्तमानात दररोज करायचा आहे. स्वराज च्या या निरंतर प्रक्रियेत अहिंसा, भेदभाव-विरहित सहजीवन, न्याय, त्याग आणि बंधुभाव ही आपली मार्गदर्शक तत्त्वे आहेत. बहुजन स्वराज चा हा मार्ग आव्हानात्मक आहे. जन्माधारित ओळखींनुसार बहुजनांचे विभाजन होणे आणि त्यांना भेदभावाला सामोरे जावे लागणे हे एक मोठे आव्हान आहे. बहुजनांना विभागून त्यांच्यावर राज्य करण्याचे अभिजनांचे धोरण फार जुने आहे. समाजात पसरलेला भेदभाव दूर करण्यासाठी संत आणि ज्ञानी-जन हजारो वर्षे संघर्ष करत आले आहेत. त्यांच्याकडून आपल्याला प्रेरणा घ्यावी लागेल. बहुजन स्वराज प्रस्थापित होत नाही, म्हणजेच सत्ता अभिजनांच्या हातात राहते, तोपर्यंत बहुजनांतील परस्पर भेदभाव मिटवणे हे आपल्यासाठी एक मोठे आव्हान राहील.

विविधता आणि भेदभाव यांतील फरक

भेदभाव आणि विविधता यांतील फरक समजून घेणे आवश्यक आहे. विविध भौगोलिक परिस्थितीत जशा वनस्पती आणि प्राणी वेगवेगळ्या रूपांत दिसतात, त्याचप्रमाणे मानवी समाजही वेगवेगळ्या रूपांत दिसावेत, हे तर्कसंगतच आहे. म्हणजेच स्थळ-काळानुरूप मानवी समाज विविधतेने प्रकट होतात. ही विविधता शारीरिक रूप-रंग, वेषभूषा, खाणेपिणे, संस्कृती इत्यादींत प्रतिबिंबित होते. पण विविधतेचा आधार घेऊन आपण भेदभाव करू लागतो, तेव्हा खरी फसवणूक होते. विविध मानवी समाजांमध्ये उच्च-नीच असा कोणताही पदानुक्रम आहे, असे आम्ही बहुजन मुळीच मानत नाही. परंतु सत्ता मिळवण्यासाठी आणि सत्तेवर टिकून राहण्यासाठी अभिजन मानवी समाजांमध्ये भेदभाव निर्माण करतात आणि त्यांना एकमेकांविरुद्ध लढवतात. मानवी समाजांना पदानुक्रमात बसवणारी सर्व आख्याने आपल्याला नाकारावी लागतील. भेदभाव-विरहित रीतीने विविधता स्वीकारून तिच्यासह जगण्याची कला – सहजीवनाची कला – आपल्याला आत्मसात करावी लागेल. हे शक्य आहे का? वेगवेगळे वंश, धर्म, भाषा आणि व्यवसाय असणाऱ्या लोकांत गोरे आणि काळे, आदिवासी आणि गैर-आदिवासी, शेतकरी आणि व्यापारी, स्त्रिया आणि पुरुष असे एक ना अनेक भेदभाव करणे आपण थांबवू शकू का?

स्वराज साठी संयम आणि साधना अंगी बाणवण्यास आपण तयार आहोत का?

जेव्हा बहुजन स्वशासित आणि स्व-अनुशासित जीवन जगतील तेव्हाच विविधतेचा स्वीकार करूनही भेदभाव-विरहित सहजीवन शक्य आहे. एका व्यक्तीच्या स्वराज मुळे दुसऱ्या व्यक्तीच्या स्वराज चे हनन होता कामा नये; तसेच एका समूहाच्या स्वराज मुळे दुसऱ्या समूहाच्या स्वराज चेही हनन होता कामा नये. म्हणून स्वराज शी स्व-संयम अभिन्नपणे जोडलेला आहे. आणि संयमाधारित स्वराज साठी निरंतर साधना आवश्यक आहे. स्वराज हा साधनेचा विषय आहे. म्हणूनच आम्ही आपल्याला सह-साधक असे संबोधले आहे. स्वराज-साधनेसाठी आपण तयार आहोत का?

आजच्या ग्रामपंचायती आणि स्थानिक स्वशासनाच्या इतर संस्था बहुजन स्वराज चे आधारस्तंभ बनू शकतात का?

आपल्या परंपरेत पंचायत हे नेहमी पासूनच सामाजिक उपक्रमांचे केंद्र आणि सामूहिक विचारविनिमय व निर्णयाचे स्थान आहे. पंचायतमध्ये पंच-परमेश्वर यांच्या मार्गदर्शनाखाली सर्वसंमतीने निर्णय घेतले जातात. या परंपरेत जरी विकृती राहिलेल्या असल्या, तरी बहुमताचे अल्पमतावर वर्चस्व प्रस्थापित करणाऱ्या आधुनिक लोकशाही पद्धतीच्या तुलनेत पंचायत अधिक स्वराजाभिमुख आहे. स्वराज साठी पंचायतच्या या महत्त्वाच्या भूमिकेकडे लक्ष वेधण्यासाठीच आम्ही या कार्यक्रमाला पंचायत असे नाव दिले आहे.

एकीकडे पंचायत ही अशासकीय सामाजिक अभिव्यक्तीची जिवंत परंपरा म्हणून आजही अस्तित्वात आहे; तर दुसरीकडे स्थानिक स्वशासनाची संस्था म्हणून ग्रामपंचायतीला संविधानाच्या ७३व्या दुरुस्तीद्वारे घटनात्मक दर्जा मिळाला आहे. बहुजन स्वराज मध्ये या पंचायती संस्थांची कोणती सकारात्मक भूमिका असू शकते, यावर विचार करणे गरजेचे आहे. ग्राम-पंचायती आणि स्वशासनाच्या इतर स्थानिक संस्थांना बहुजन स्वराज चे पायाभूत स्तंभ बनवता येईल, असे आम्हाला वाटते. हे शक्य करण्यासाठी पंचायती संस्थांना आणखी कोणते घटनात्मक अधिकार द्यावेत आणि त्यांना आर्थिकदृष्ट्या कसे सक्षम करावे, हे विचारार्थ मुद्दे आहेत. उदाहरणार्थ, मतदार याद्या तयार करणे, नागरिकत्वाची खातरजमा करणे, अन्नसुरक्षा / अन्न सार्वभौमत्वाची हमी देणे आणि स्थानिक संसाधनांचे व्यवस्थापन करणे अशी अनेक कामे पंचायतांच्या अधिकारक्षेत्रात आणता येतील. विशेषतः लोकशाहीचा सर्वांत मौलिक आणि सक्षम सामाजिक संस्था म्हणून ग्रामसभांचे पुनरुज्जीवन करणे हे बहुजन स्वराजाच्या दिशेने महत्त्वाचे पाऊल ठरेल.

सर्वांत मोठी अडचण ग्राम-पंचायतींची निवडणूक-प्रक्रिया आणि ग्राम-पंचायतींमधील निर्णयपद्धतीशी संबंधित आहे. पंचायत सदस्य आणि सरपंच यांच्या निवडणुका बहुमताच्या आधारावर घेण्याच्या सध्याच्या पद्धतीमुळे विजयी व पराभूत उमेदवारांतील कटुतेतून गावात गटबाजी वाढते. सर्वाधिक मते मिळालेल्या उमेदवाराला विजयी घोषित करण्याची पद्धत सोडण्याचाही विचार करावा लागेल. पंचायत सदस्यांमध्ये सर्वसंमतीने निर्णय घेण्याची पंचायती परंपरा पुन्हा प्रस्थापित करावी लागेल. पंचायतांवरील सरकारी यंत्रणेचा – जिल्हाधिकारी आणि त्यांचे प्रतिनिधी यांचा – हस्तक्षेप आणि हुकूमशाही संपवावी लागेल. पंचायतला केवळ सरकारी योजना राबवणारी संस्था बनवण्याचे धोरण सोडावे लागेल. आपल्या क्षेत्रातील जल, जंगल, जमीन आणि इतर स्थानिक संसाधनांच्या व्यवस्थापनासंबंधी निर्णय घेण्यासाठी पंचायत स्वतंत्र असली पाहिजे. म्हणून पंचायतींची कार्यपद्धती आणि अधिकार काय असावेत, याचा पुनर्विचार करण्याची गरज आहे.

विकासाच्या नावाखाली जल-जंगल-जमिनीपासून बहुजनांचे विस्थापन – बहुजन स्वराज वरील हा कुठाराघात कसा थांबवायचा?

बहुजनांच्या जीवनाचा आधार जल, जंगल आणि जमीन आहे. हा आधार हिरावला गेला, तर बहुजन स्वराज च्या शक्यता मोठ्या प्रमाणात संपुष्टात येतात. ही नैसर्गिक संसाधने भौगोलिकदृष्ट्या विखुरलेली आहेत; त्यामुळे त्यांचे सरकारी केंद्रीकृत व्यवस्थापन विरोधाभासपूर्ण आणि विनाशकारी ठरले. प्रत्यक्षात, ब्रिटिश येण्यापूर्वी आपल्या देशातील जल, जंगल आणि जमिनीचे सामूहिक व्यवस्थापन ग्रामस्थ करत असत. त्यांची सामूहिक मालकी ग्रामीण जनतेकडे होती. परंतु ब्रिटिशांनी सर्व जल, जंगल आणि जमीन ही सरकारची मालमत्ता घोषित केली. त्याचबरोबर सामूहिक मालकीची पद्धतच संपवून वैयक्तिक मालकीची व्यवस्था लागू केली. त्याचे दुष्परिणाम आज आपल्यासमोर आहेत. अनादिकाळापासून जंगलांत राहणाऱ्या आदिवासींना जंगलांतून हाकलले जात आहे. स्वतःची आणि ग्रामसभेची संमती नसताना शेतकऱ्यांना त्यांच्या सुपीक जमिनीपासून आणि त्यांच्या स्वराजाभिमुख व्यवसायापासून – शेतीपासून – विस्थापित केले जात आहे. पुनर्वसन आणि पुनर्स्थापनेची व्यवस्था न करता शेतकऱ्यांना बेघर, निराधार आणि भटकंतीचे जीवन जगण्यास भाग पाडले जात आहे. शेतकरी आणि आदिवासी यांच्या स्वराज च्या शक्यतांवर कुठाराघात केला जात आहे आणि त्यांना ‘विकास’ नावाच्या राक्षसाला बळी दिले जात आहे. जल, जंगल आणि जमीन यांवर बहुजनांच्या सामूहिक व्यवस्थापनाचे धोरण लागू केल्याशिवाय बहुजन स्वराज अशक्य आहे. या विषयावरही बहुजन स्वराज पंचायतमध्ये महत्त्वपूर्ण चर्चा होईल.

ज्ञान, स्वराज, शिक्षण आणि रोजगार – जेन-झी आंदोलनाबाबत बहुजन दृष्टिकोन काय आहे?

स्वराज चा आधारच ज्ञान आहे. अज्ञानी व्यक्तीला स्वराज मिळणे अशक्य आहे; मिळाले तरी ते अल्पकाळच टिकेल. कारण इतर ज्ञानवान लोक लवकरच तिच्यावर वर्चस्व प्रस्थापित करतील. म्हणून समाजातील प्रत्येक व्यक्ती ज्ञानी असणे ही स्वराज प्रस्थापित होण्याची पहिली अट आहे. आणि समाजातील प्रत्येक व्यक्ती ज्ञानी आहे, असे आम्ही मानतो. एखाद्या व्यक्तीच्या ज्ञानात काही कमतरता असली, तरी ती भरून काढण्याची क्षमता त्या व्यक्तीकडे असते. ज्ञान केवळ अभिजन, तज्ज्ञ, वैज्ञानिक, अभियंते, डॉक्टर किंवा विद्यापीठे आणि उच्च शिक्षण संस्थांत शिकून पदवी मिळवलेल्यांकडेच असते, हे आम्ही अमान्य करतो. शेतकरी, कारागीर, आदिवासी आणि महिला – बहुजन – शिकलेले नसतील, पदवीधारक नसतील, तरी ते आपल्या लोकविद्येच्या बळावर स्वतंत्रपणे उपजीविका करतात. तेही ज्ञानी आहेत. ज्ञान केवळ विद्यापीठे किंवा उच्च शिक्षण संस्थांतच केंद्रित आहे आणि अन्यत्र कुठेही नाही, असा विचार केवळ चुकीचाच नाही तर तो बहुजनांच्या लोकविद्येचा अनादर आणि अपमान करणारा आहे. बहुजनांच्या शोषणाची आणि गुलामीची आणि सामाजिक विषमतेची कहाणी अभिजनांनी बहुजनांच्या ज्ञानाला ज्ञान न मानण्या पासून सुरू होते. म्हणून लोकविद्येला मान्यता आणि प्रतिष्ठा देणे व मिळवून देणे हे बहुजन स्वराज चे महत्त्वाचे कार्य आहे.

विद्या, विद्यालये, शैक्षणिक संस्थांची स्वायत्तता, शिक्षण धोरण, परीक्षा पद्धती, सरकारी नोकऱ्यांसाठीची निवड प्रक्रिया, रोजगाराभिमुख शिक्षण, कौशल्यविकास इत्यादी अनेक विषयांवर जेन-झी आंदोलनाच्या संदर्भात देशात मोठ्या प्रमाणात चर्चा सुरू आहेत. या सर्व विषयांचा संबंध लोकविद्या आणि बहुजन स्वराज शी आहे. बहुजन समाजातून आलेले बेरोजगार तरुण जेन-झी आंदोलनात मोठ्या संख्येने सहभागी होत आहेत. अशा परिस्थितीत बहुजन स्वराज च्या बाजूने असलेल्या सामाजिक कार्यकर्त्यांनी जेन-झी आंदोलनाबाबत तटस्थ राहणे योग्य नाही. तटस्थ राहून आपण बहुजन युवा वर्गाशी संवाद साधण्याची एक चांगली संधी गमावू. बहुजन स्वराज पंचायतमध्ये शिक्षण, रोजगार आणि जेन-झी आंदोलनाबाबत बहुजन दृष्टिकोन काय आहे, या विषयावर एक सत्र आयोजित केले पाहिजे. यासंबंधी आपले विचार आमंत्रित आहेत.

आंतरराष्ट्रीय परिस्थितीसंबंधी आमची समज थोडक्यात

ज्यात अमेरिकेच्या नेतृत्वाखाली पाश्चात्त्य देशांनी कृषीसह आंतरराष्ट्रीय व्यापार आणि भांडवली गुंतवणुकीवर आपले वर्चस्व प्रस्थापित केले होते असा जागतिकीकरणाचा काळ संपला आहे,. ते अमेरिकेच्या नियंत्रणाखालील एकध्रुवीय जग होते. गेल्या वीस-पंचवीस वर्षांत चीनची ताकद अतिशय वेगाने वाढली आहे. सोव्हिएत युनियनच्या विघटनानंतर रशियानेही आपले लष्करी बळ, अण्वस्त्रे, कच्चे तेल आणि वायू तसेच इतर नैसर्गिक संसाधने यांच्या आधारे आपली शक्ती पुन्हा मिळवण्यात बऱ्यापैकी यश मिळवले आहे. त्यामुळे आजचे जग बहुध्रुवीय झाले आहे. एकीकडे वर्चस्व संपुष्टात येत असल्यामुळे पाश्चात्त्य जगात जागतिकीकरण आणि बहुपक्षीय करार व संस्थांविरोधी वातावरण तयार झाले आहे; तर दुसरीकडे चीन जागतिकीकरण आणि बहुपक्षीय संस्थांचा पुरस्कर्ता म्हणून पुढे येत आहे. त्याचबरोबर जगभरात निरंकुश भांडवलशाही शक्ती आणि राजसत्ता यांची वाढती हातमिळवणी होत असल्यामुळे सर्वत्र हुकूमशहांचा उदय होत आहे. जगाची लोकसंख्या आणि तिचे उपक्रम स्वतःच्या अजेंड्यानुसार नियंत्रित करण्याची त्यांची इच्छा आहे. त्यासाठी AI – कृत्रिम बुद्धिमत्ता – याचा आधार घेतला जात आहे. राष्ट्र, सार्वभौमत्व, लोकशाही इत्यादी संकल्पना अप्रासंगिक होत चालल्या आहेत. जगासमोर स्वराज हा एक सक्षम पर्याय म्हणून मांडता येईल का?

वर वर्णन केलेल्या विचारार्थ मुद्द्यांवरील आपली प्रतिक्रिया आम्हाला जाणून घ्यायची आहे. आपण आपली प्रतिक्रिया लिहून पाठवली, तर आम्ही आपले आभारी राहू. पंचायतमध्ये कोणती विषय-निहाय सत्रे असावीत हे ठरवण्यास त्यामुळे आम्हाला मदत होईल.

सत्रे कोणती असतील आणि ती केव्हा होतील, याची सविस्तर माहिती पुढील पत्रात दिली जाईल. आपण पंचायतमधील आपल्या उपस्थितीची पुष्टी लवकरात लवकर पाठवावी आणि त्यासोबत आपली लिखित प्रतिक्रिया / सूचनाही पाठवाव्यात, अशी आम्ही पुन्हा विनंती करतो.

सधन्यवाद,

विद्या आश्रम, वाराणसी आणि गांधी भवन, छतरपूर यांच्या वतीने

 

             कृष्ण गांधी, झांसी                                                दमयंती पानी, छतरपुर                 

(मोबाइल व्हाट्सएप्प: 9415057535)                     (मोबाइल व्हाट्सएप्प: 9399080336)

दिनांक: 17 सितंबर 2026


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Dear Fellow Practitioner,

You are cordially invited to the above three-day Panchayat.

This invitation is being sent well in advance so that you can avoid a clash with other programmes on those dates and make travel reservations and related arrangements well in advance. We hope that you will confirm your participation one week before the Panchayat.

Broadly speaking, the organisers of this Panchayat have participated in movements that have emerged across the country since the 1980s, including the farmers’ movement, the PPST (Patriotic People-oriented Science and Technology) campaign, and the Lokavidya Jan Andolan. They have also been organisationally associated with Vidya Ashram, Varanasi. Our group has maintained a continuing dialogue about these movements and the national and international developments during this period, and has kept working towards a shared understanding.

We have received the full cooperation of Gandhi Bhavan, Chhatarpur, in organising this Panchayat. We are grateful to Shri Sanjay Singh and Ms Damayanti Pani for this. Several social activists from Chhatarpur and the surrounding areas will participate in the Panchayat.

Issues for Consideration at the Bahujan Swaraj Panchayat

Who are the Bahujan? Do we consider ourselves Bahujan? What does it mean to regard ourselves as Bahujan?

By Bahujan we mean ordinary people who live ordinary lives: people who do not consider themselves exceptional or claim to be so. They do not share in state power; rather, they suffer at its hands. Outside colleges, universities, research institutes and other institutions of organised knowledge, they earn their livelihoods through their own understanding, skills and vidya (that is, Lokavidya), acquired from experience and from sources of unorganised knowledge present in society. The Bahujan principally include farmers, artisans, Adivasis, women, small traders and small entrepreneurs who participate in unorganised and distributed systems of production and distribution. However, the Bahujan need not come only from these categories; all people who live ordinary lives are Bahujan. Defining the Bahujan is relatively easy. The real challenge is to identify and live as Bahujan. What does it mean to regard ourselves fundamentally as Bahujan? Are we ready to accept Bahujan as our primary identity?

Who determines the destiny of the Bahujan? Will the Bahujan take into their own hands the right to determine their destiny? What do we understand by Bahujan Swaraj?

In our country, power and knowledge have been monopolised by elite people (those who harbour the illusion that they are exceptional). Whether they are elites associated with Western thought, civilisation or knowledge, or elites associated with India’s Brahmanical tradition, both believe that, being exceptional, it is their responsibility to lead the Bahujan along the path of progress and development, to guide and lead them, and to rule over them. In short, the elites have assumed for themselves the right to determine the destiny of the Bahujan. Today, however, the Bahujan are awakening. Rather than leave it to an elite class, institution or government to decide what their well-being consists in and how it should be achieved, the Bahujan want to take their destiny into their own hands. Will they be able to do so? The prospects of Bahujan Swaraj depend greatly on this question.

Swaraj means finding for oneself the path to one’s own well-being and attaining it through one’s own efforts. Rather than a distant goal, Swaraj is a continuous process that we must practise every day in the present. In this continuing practice of Swaraj, non-violence, non-discriminatory coexistence, justice, sacrifice and fraternity are our guiding principles. This path to Bahujan Swaraj is challenging. One major challenge is the division of the Bahujan on the basis of identities associated with birth and the discrimination they suffer as a result. The elitist policy of dividing the Bahujan in order to rule over them is very old. For thousands of years, saints and wise people have struggled to end the discrimination prevalent in society. We must draw inspiration from them. Until Bahujan Swaraj is established – that is, as long as power remains in elite hands – eliminating discrimination among the Bahujan themselves will remain a major challenge.

The Difference between Diversity and Discrimination

It is important to understand the difference between discrimination and diversity. It seems reasonable that, just as plants and animals appear in different forms under different geographical conditions, human societies too take different forms under different geographical conditions. In other words, human societies manifest diversity in accordance with place and time. This diversity is reflected in physical appearance, dress, food, culture and other aspects of life. Deception begins, however, when diversity is made the basis of discrimination. We, the Bahujan, do not accept that different human societies can be ranked in a hierarchy of higher and lower. Yet, in order to gain and retain power, the elites discriminate among human societies and set them against one another. We must reject every narrative that places human societies in a hierarchy. We must learn the art of accepting diversity and living with it without discrimination – the art of coexistence. Is this possible? Will we be able to stop discriminating between people of different races, religions, languages and occupations – between white and black people, adivasis and non-adivasis, farmers and traders, and women and men?

Are We Ready to Practise Restraint and Sadhana for Swaraj?

Non-discriminatory coexistence amid diversity is possible only when the Bahujan lead self-governing and self-disciplined lives. One person’s Swaraj must not infringe upon another person’s Swaraj, nor should the Swaraj of one group infringe upon that of another. Swaraj is therefore inseparably linked with self-restraint. And Swaraj based on restraint requires continuous practice, or sadhana. In other words, Swaraj is the subject of our sadhana. That is why we have addressed you as a fellow practitioner. Are we ready for the sadhana of Swaraj?

Can Today’s Gram Panchayats and Other Units of Local Self-Government Become the Foundational Pillars of Bahujan Swaraj? What Are the Possibilities?

In our tradition, the panchayat has been the centre of social activity and a place for collective deliberation and decision-making. In the panchayat, decisions are taken by consensus under the guidance of Panch Parmeshwar. Although this tradition has had its distortions, the panchayat is far more oriented towards Swaraj than the modern democratic practice of establishing the dominance of the majority over the minority. We have called this programme a Panchayat precisely to draw attention to this important role of the panchayat in Swaraj.

While the panchayat continues to exist as a living tradition of non-governmental social expression, the gram panchayat has received constitutional status as a unit of local self-government through the 73rd Amendment to the Constitution. We need to consider the positive role these panchayati institutions can play in Bahujan Swaraj. We believe that gram panchayats and other units of local self-government can be made the foundational pillars of Bahujan Swaraj. What additional constitutional powers should be granted to panchayati institutions to make this possible, and how they should be strengthened financially, are matters for consideration. Preparing electoral rolls, confirming citizenship, guaranteeing food security and sovereignty, and managing local resources are among the many functions that could be brought within the jurisdiction of panchayats. In particular, reviving gram sabhas as the lowest and most empowered level of democracy would be an important step towards Bahujan Swaraj.

The greatest problem concerns the electoral process for gram panchayats and the method of decision-making within them. Under the present practice of electing panchayat members and sarpanches by majority vote, bitterness between winning and losing candidates gives rise to factionalism in the village. We must also consider abandoning the system of declaring the candidate with the most votes the winner. The panchayati tradition of decision-making by consensus among panchayat members must be restored. Interference and authoritarian control by the government machinery – district magistrates and their representatives – must end. The policy of reducing the panchayat to an institution that merely implements government schemes must be abandoned. Panchayats must be free to decide how local resources in their areas, including water, forests and land, are to be managed. The functioning and powers of panchayats therefore need to be reconsidered.

Displacement of the Bahujan from Water, Forests and Land in the Name of Development – How Can This Assault on Bahujan Swaraj Be Stopped?

The lives of the Bahujan are founded on water, forests and land. If this foundation is taken away, the possibilities of Bahujan Swaraj largely disappear. These natural resources are geographically distributed, and centralised government management of them is therefore contradictory and destructive. In fact, before the arrival of the British, water, forests and land in our country were collectively managed by rural communities. Their collective ownership rested with the rural people. The British, however, declared all water, forests and land to be government property. At the same time, they abolished the very practice of collective ownership and imposed a system of individual ownership. Its harmful consequences are before us today. Adivasis who have lived in forests since time immemorial are being driven out. Without their own consent or that of the gram sabha, farmers are being displaced from their fertile land and from agriculture – their Swaraj-oriented occupation. Without arrangements for rehabilitation and resettlement, farmers are being forced into a homeless, destitute and itinerant existence. The possibilities of Swaraj for farmers and Adivasis are being struck a severe blow, and they are being made victims of the demon called ‘development’. Bahujan Swaraj is impossible without a policy of collective Bahujan management of water, forests and land. This subject too will be discussed extensively at the Bahujan Swaraj Panchayat.

Knowledge, Swaraj, Education and Employment – What Is the Bahujan Perspective on the Gen-Z Movement?

Knowledge is the very foundation of Swaraj. A person without knowledge cannot attain Swaraj; even if they do attain it, it will endure only briefly, because other knowledgeable people will soon establish their dominance over them. Thus, the first condition for establishing Swaraj is that every person in society should possess knowledge. And we believe that every person in society does possess knowledge. Even if there is some deficiency in a person’s knowledge, that person has the capacity to overcome it. We do not believe that knowledge belongs only to elite people, experts, scientists, engineers, doctors, or those who have earned degrees from universities and institutions of higher education. Farmers, artisans, adivasis and women – the Bahujan – may not be formally educated or hold degrees, yet they earn their livelihoods independently on the strength of their Lokavidya. They too possess knowledge. To believe that knowledge is concentrated only in universities or institutions of higher education and exists nowhere else is not merely wrong; it also disregards and insults the Lokavidya of the Bahujan. The story of the exploitation and enslavement of the Bahujan begins with this inequality: the elite refusal to recognise Bahujan Lokavidya as knowledge. Recognising Lokavidya, affirming its dignity and securing recognition for it are therefore important tasks of Bahujan Swaraj.

Across the country, many discussions are taking place in the context of the Gen-Z movement on vidya, schools, the autonomy of educational institutions, education policy, examination systems, selection processes for government jobs, employment-oriented education, skill development and related issues. All these matters are connected with Lokavidya and Bahujan Swaraj. Large numbers of unemployed young people from Bahujan society are participating in the Gen-Z movement. In these circumstances, it would not be appropriate for social activists who support Bahujan Swaraj to remain neutral towards the Gen-Z movement. By remaining neutral, we would lose a valuable opportunity for dialogue with Bahujan youth. A session should therefore be held at the Bahujan Swaraj Panchayat on the Bahujan perspective on education, employment and the Gen-Z movement. We invite your views on this proposal.

Our understanding of the international situation is summarised very briefly below:

The era of globalisation, during which Western countries led by the United States established their dominance over international trade – including agriculture – and capital investment, has ended. It was a unipolar world under United States control. Over the past twenty to twenty-five years, China’s power has grown very rapidly. After the break-up of the Soviet Union, Russia too has largely succeeded in regaining its power on the strength of its military capability, nuclear weapons, oil and gas, and other natural resources. The world has thus become multipolar. While the loss of Western dominance has created an atmosphere in the Western world against globalisation and multilateral agreements and institutions, China is emerging as a champion of globalisation and multilateral institutions. At the same time, the growing nexus between authoritarian capitalist forces and state power throughout the world is giving rise to dictators everywhere. They seek to control the world’s population and its activities in accordance with their own agenda. AI – artificial intelligence – is being used for this purpose. Concepts such as nation, sovereignty and democracy are becoming irrelevant. Can Swaraj be presented to the world as a powerful alternative?

We would like to know your response to the issues raised above for consideration. We would be grateful if you would send us your response in writing. It will help us decide the subject-specific sessions to be held at the Panchayat.

Detailed information about the sessions and their schedule will be provided in the next letter. We once again request that you confirm your participation in the Panchayat at the earliest and also send us your written response and suggestions.

With thanks.

On behalf of Vidya Ashram, Varanasi, and Gandhi Bhavan, Chhatarpur

Krishna Gandhi, Jhansi                                               Damyanti Pani, Chhatarpur

(Mobile, WhatsApp : 941557538).                            (Mobile WhatsApp: 93990 80336)

Date: 17/09/202

 

 

 

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